Saturday, June 19, 2021

कीर्तन ।

कीर्तन कब हो सकता है ??

दो चीज जब तक जीवन में से नहीं हटी गायन तो हो सकता है पर कीर्तन नहीं हो सकता। गायन करना और कीर्तन करने में फरक है। जब तक तुम्हारे जीवन में से या तुम्हारे स्वभाव में से कीर्ति और तन की चिंता नहीं मिटेगी तब तक कीर्तन नहीं हो सकता। तब तक गायन कर सकते हो। 

गायन तो कोई भी सुरीला कर सकता है गायन तो बड़े बड़े लोग करते थे तानसेन भी गाता था। तानसेन गायक था स्वामी हरिदास कीर्तनिया थे। फरक है दोनों में। जो कीर्ति और तन से ऊपर उठा वो कीर्तनिया है। 

मीरा गाती थी- 
लोग कहे मीरा भयी बाँवरी सास कहे कुल नाशी रे।
इस पद पर मीरा कीर्ति से ऊपर उठ गयी और 
राणा भेज्यो विष को प्यालो पीवत मीरा हाँसी रे।।
इस लाइन में मीरा तन से ऊपर उठ गयी इसलिए जब मीरा बोलती थी तब गिरधर नाचता था। 

गायक जगत को नचाते हैं और कीर्तनिया जगन्नाथ को नचाते हैं।

Friday, June 18, 2021

निर्जला एकादशी

21 जून को आनेवाली सबसे पावन और पवित्र निर्जला एकादशी के व्रत की विधि

- निर्जला एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद भगवान कृष्ण की पूजा आरती करें, अधिक से अधिक हरे कृष्ण महामंत्र का जप करें, भगवद गीता, श्रीमद भागवतम का श्रवण करें, अध्ययन करें और यथाशक्ति दान करें | 
- पुरे दिन निर्जल और निराहार रहें | 
- द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद पारण समय के अनुसार जल ग्रहण करके इस व्रत का समापन करें | 
- यदि आप शारीरिक रूप से अस्वस्थ हैं तो कृपया अपने डॉक्टर द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करें। 
- यदि आप निर्जल व्रत रखने में असमर्थ हैं तो सामान्य एकादशीयों की तरह भी व्रत रख सकते है।
- इस तरह जो भी यह पवित्र एकादशी व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर मोक्ष के योग्य बनता है।
वर्ष में केवल एक बार आने वाले इस सुअवसर का लाभ उठायें, व्रत अवश्य रखें।

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Sunday, June 13, 2021

छप्पन भोग

((( छप्पन भोग क्यों लगाते है…? ))))
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भगवान को लगाए जाने वाले भोग
की बड़ी महिमा है। इनके लिए 56 प्रकार के व्यंजन परोसे जाते हैं, जिसे छप्पन भोग कहा जाता है।
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यह भोग रसगुल्ले से शुरू होकर दही, चावल, पूरी, पापड़ आदि से होते हुए इलायची पर जाकर खत्म होता है।
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अष्ट पहर भोजन करने वाले बालकृष्ण भगवान को अर्पित किए जाने वाले छप्पन भोग के पीछे कई रोचक कथाएं हैं।
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ऐसा कहा जाता है कि यशोदा जी बालकृष्ण को एक दिन में अष्ट पहर भोजन कराती थी। अर्थात् श्री बालकृष्ण लाल आठ बार भोजन करते थे।
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जब इंद्र के प्रकोप से सारे व्रज को बचाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत
को उठाया था, तब लगातार सात दिन तक
भगवान ने अन्न जल ग्रहण नहीं किया।
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आठवे दिन जब भगवान ने देखा कि अब इंद्र की वर्षा बंद हो गई है, सभी व्रजवासियो को गोवर्धन पर्वत से बाहर निकल जाने को कहा..
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तब दिन में आठ प्रहर भोजन करने वाले व्रज के नंदलाल कन्हैया का लगातार सात दिन तक भूखा रहना उनके व्रज वासियों और मैया यशोदा के लिए बड़ा कष्टप्रद हुआ।
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भगवान के प्रति अपनी अन्न्य श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए सभी व्रजवासियो सहित यशोदा जी ने 7 दिन और अष्ट पहर के हिसाब से 7X8= 56 व्यंजनो का भोग बाल कृष्ण को लगाया।
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गोपिकाओं ने भेंट किए छप्पन भोग...
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श्रीमद्भागवत के अनुसार, गोपिकाओं ने एक माह तक यमुना में भोर में ही न केवल स्नान किया, अपितु कात्यायनी मां की अर्चना भी इस मनोकामना से की, कि उन्हें नंदकुमार ही पति रूप में प्राप्त हों।
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श्रीकृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति की सहमति दे दी।
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व्रत समाप्ति और मनोकामना पूर्ण होने के
उपलक्ष्य में ही उद्यापन स्वरूप गोपिकाओं ने छप्पन भोग का आयोजन किया।
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छप्पन भोग हैं छप्पन सखियां...
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ऐसा भी कहा जाता है कि गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं।
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उस कमल की तीन परतें होती हैं। प्रथम परत में “आठ”, दूसरी में “सोलह”
और तीसरी में “बत्तीस पंखुड़िया” होती हैं।
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प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में श्री भगवान विराजते हैं।
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इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है। 56 संख्या का यही अर्थ है।
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छप्पन भोग इस प्रकार है...
1. भक्त (भात),
2. सूप (दाल),
3. प्रलेह (चटनी),
4. सदिका (कढ़ी),
5. दधिशाकजा (दही शाक की कढ़ी),
6. सिखरिणी (सिखरन),
7. अवलेह (शरबत),
8. बालका (बाटी),
9. इक्षु खेरिणी (मुरब्बा),
10. त्रिकोण (शर्करा युक्त),
11. बटक (बड़ा),
12. मधु शीर्षक (मठरी),
13. फेणिका (फेनी),
14. परिष्टïश्च (पूरी),
15. शतपत्र (खजला),
16. सधिद्रक (घेवर),
17. चक्राम (मालपुआ),
18. चिल्डिका (चोला),
19. सुधाकुंडलिका (जलेबी),
20. धृतपूर (मेसू),
21. वायुपूर (रसगुल्ला),
22. चन्द्रकला (पगी हुई),
23. दधि (महारायता),
24. स्थूली (थूली),
25. कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी),
26. खंड मंडल (खुरमा),
27. गोधूम (दलिया),
28. परिखा,
29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त),
30. दधिरूप (बिलसारू),
31. मोदक (लड्डू),
32. शाक (साग),
33. सौधान (अधानौ अचार),
34. मंडका (मोठ),
35. पायस (खीर)
36. दधि (दही),
37. गोघृत,
38. हैयंगपीनम (मक्खन),
39. मंडूरी (मलाई),
40. कूपिका (रबड़ी),
41. पर्पट (पापड़),
42. शक्तिका (सीरा),
43. लसिका (लस्सी),
44. सुवत,
45. संघाय (मोहन),
46. सुफला (सुपारी),
47. सिता (इलायची),
48. फल,
49. तांबूल,
50. मोहन भोग,
51. लवण,
52. कषाय,
53. मधुर,
54. तिक्त,
55. कटु,
56. अम्ल.
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  ((((((( जय जय श्री राधे )))))))
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Wednesday, June 9, 2021

सिलाई मशीन ।

सिलाई मशीन में धागा ना डालने पर वह चलती जरूर है पर कुछ सिलती नहीं, उसी प्रकार श्वासों में भगवान का नाम नहीं डालेंगे तो वह चलेंगे तो जरुर पर व्यर्थ हो जाएंगे। वही श्वास, वही पल, वही आंसू जो  हरि के लिए बहाए वही हमारे काम आएंगे बाकी सब व्यर्थ हैं।
सदा भगवान के पवित्र नमो का जाप करें 

हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे

Saturday, June 5, 2021

भक्त

भक्त का संबंध जब भगवान से है। तब वह हर तरह से तृप्त है। क्योंकि वहां कोई इच्छा शेष नहीं ? एक इच्छा शेष बचती है, कि वह अपने आराध्य के करीब रहे।

वहीं संसार के बंधनों से व्यक्ति कभी तृप्त नहीं । जिससे भी प्रेम करें, न जाने कब इस संसार से रुकसत हो, हमें धोखा दे दे । वह मां हो,बाप हो, भाई, बहन, बंधु, सखा मित्र कोई भी हो सकता है। यही सच है।

तो फिर सांसारिक बंधनों से प्रेम करना तो सही,  मगर जकड़ना सही नहीं, जकड़ कर फिर दुख के सिवा कुछ हाथ नहीं आता।  क्योंकि जो चला गया वो लौटकर नहीं आएगा और निश्चित जाना हम सबको है, सबका दिन समय क्षण पल तय है, सब प्रारब्ध है, तो फिर मोह में जकड़ना क्यों ? 

जकड़ना ही है, बंधना ही है, तो उससे मोह करें उससे जकड़े। जो मृत्यु उपरांत हमें स्वयं लेने आएंगे। हमारे भगवान, जो हमारी माता पिता बंधु सखा मित्र सभी कुछ है। जहां सभी रिश्तों नातों का सुख है परमानंद है। 

परम आनंद की अनुभूति व्यक्त नहीं की जा सकती। सिर्फ स्वयं अनुभव की जा सकती है। जो इस लोक में भी आनंद देती है और परलोक में भी परम आनंद देती है। परम आनंद की गहराई में उतरने के लिए स्वयं की खोज करनी होगी।

Tuesday, June 1, 2021

Srilā Prabhupāda's Lecture

"When I was householder, my second son—he was about four years old—he was walking with me on the street, and he was asking me, "Father, why the moon is going with us? Why the moon is going with us?" Yes. The moon is... As you find that the moon is going with you, similarly, by chanting, if the moon has got such power—it is a material thing; it can go with you—don't you think the Supreme Lord, who is all-powerful, He cannot remain with you? Yes. He can. By His potency, He can remain with you, provided you are also qualified to keep His company. If you are a pure devotee and if you are always merged in the thought of Kṛṣṇa, you should always remember that Kṛṣṇa is with you. Kṛṣṇa is with
you."

[Srilā Prabhupāda's Lecture on BG 8.22-27 - New York, November 20, 1966]